Saturday, June 14, 2025

शायरी की बात 

जो बलवान था खुद की भुजाओं से 

वह भी  डूब गया इक दिन जीवन की सचाई मे |

वो जो शहंशाह थे अपने जमीर के 

की बिक गये एक  दिन ईमान के बाजार मे। 

जंजीरों की जकड़न सा ,

ये समय का फितूर है कुछ ऐसा ,

की आजादी की ख्वाइश मे 

अब दस्तूर नहीं है वैसा | 

उम्र का तकीजा देख ग़ालिब ,

जवानी की कसरतें 

बुढ़ापे की हसरतें 

ना मंजूर हैं ,एक दूसरे को |

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