खंडर की गूंज
1 बरसों से वीरान पड़े
इस खंडर के पत्थरों
ने भी जिया होगा उस लम्हे
को ,जिस में खुशी की
लहर थी
,
किश्ती थी
और थे कुछ सवार |
2 अधूरी कहानी के
ये आखिरी किरदार
त्रस्त हैं, आज
शोर गुल की
बेरुखी हलचल से,
और अनजान कदमों
की आहट से,,
3 ये सुनसान
खंडर मोहताज थे
कभी हस्ती खेलती
जिदंगी से,
जो पल आज भी
मोजूद हैं
,इन टूटे
पथरों की तस्वीर पर,
जिसे वक्त की
ने फीका
कर दिया, अपनी
रफ्तार से ,
4 देखो जरा
कभी
एकांत के चश्मे, से
गुमनामी
की गवाही
देती ये
दास्तान,
जिसने आज भी
मोजूदगी से
इन खँड़रों की
गूंज को जिंदा रखा
है |
5 भटकी,
गुजरी आवाजों
को आज भी तालाश है
उन कानों
की ,
कह के
जिन्हे
ये अपनी बरसों की
बची कसक, लौट
जायें फिर गूँजते
मौन के पास |
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