एकांत की दस्तक
वक़्त की इस दौड़ मे कहीं तो
कुछ रुका हुआ है ,
जो सामने होते हुए
भी नजरों से बचा हुआ है ,
पल की गहराई मे जो है
ओझल परतों के साये में ,
तारों सा फासला कहीं तो।,
फिर भी मौजूद, हमारे हमसाये मे,
भागदौड़ की बेचैनी में
सुकून का आखिरी शहर है वो।
मन की सीमाओं से परे
एकांत का अंतिम पहर है वो ,
जिंदगी की धुप में वो
छाँव है गुलजार की ,
घोर अँधेरी रात में तड़प
जैसे चाँद के इन्तजार की,
रेगिस्तान की तपती रेत में
बारिश की पहली रात है वो ,
बसंत के यौवन में मदहोश
फूलों की आपसी बात है वो ,
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